आशुपुराण
ख़्यालों पर अब बंदिशें लगने लगी हैं।
मैं अपनी हदों को बख़ूबी जानता हूँ… मैं समन्दर की लहर सा किनारे से लौट आया… #आशु Read more
सोचा राख़ उड़ा दूँ आसमाँ में खुदकी.. मगर जिस हाँथ की लाठी हूँ उसका क्या होगा… #आशु Read more
अपने ही सपनों का पंख बना लो मुझे.. आज फिर जमीं से आसमाँ हो जाना चाहता हूँ… #आशु Read more
ज़िन्दगी की ज़द में फँसा देख’कर… मौत दूर खड़ी चिढाती है मुझे… Read more
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मैं नापना चाहता हूं तुम्हारी मुसीबतों की गहराई को , ताकि अपनी मुहब्बत से इन मुसीबतों को अपना बना सकुं.. Read more
यदि हम दोनों में प्रेम है…ऐसा प्रेम जिसे ईश्वरीय सम्बोधन मिलता है, तो हम वहाँ मिलेंगे जहाँ जरा-मरण के इन बन्धनों का ह्रास होता है, जहां प्रेय का रूपांतर असीम आत्म-रति में होता है…हाँ वहाँ मिलेंगे… Read more
बन्धनों से मुक्त और अपेक्षा रहित प्रेम तो केवल माँ करती है अपनी संतान से… Read more
क्या तुम ये जानती हो कि जीवन के प्रत्येक आयाम में तुम भी मेरी ही तरह अपूर्ण हो… #आशु Read more
समुद्र की गहराई और हिमालय की ऊँचाई जैसा प्रेम की अनुभूति चाहिए तुमसे! Read more
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