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तुम सौम्य शहज़ादी…तुम्हारे भीतर गहरे में क्या हैं..?जंगल या मरुस्थल…? क्यूं भटक जाता हूं, क्यूं खो जाता हूं..? या है भीतर गहरे में वो राज तुम्हारे..शीतल मन और सुनहरा देह तुम्हारा.. उतर जाने दो भीतर गहरे में,समंदर सी आंखों के रास्ते..करने दो सुलह..तेरे हृदय का स्पंदन, मेरे रक्त के संचार को.. ~आशु Read more
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हम सबकी मनाकांक्षा होती है, जिसे हम कई बार औरों की वजह से उसे अपने अंदर कैद रहने देते हैं। एक ख़त लिखना चाहता हूं तुम्हारे नाम …. कभी कभी खुद को खुद के सामने बिठा कुछ सवाल कुछ जवाब लेने का मन होता है तो कभी जिंदगी को ठेंगा दिखा खिलखिलाकर भाग जाने का… Read more
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तुम्हारा प्रेम और मेरी प्रतीक्षा..दोनों अनंत हैं.. Read more
