आशुपुराण

ख़्यालों पर अब बंदिशें लगने लगी हैं।

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  • हे भाग्यलक्ष्मी, प्रकाश और ध्वनि..समस्त सृष्टि के दो अविभाज्य भाग,एक मैं जो तुममें प्रत्यवर्तित होता हूँ और,एक तुम जो मुझमें प्रतिध्वनित होती हो.. शुभोदयम् स्नेहाशीष 💜आशु Read more

  • नींद

    जब रातभर नींद ही आँखों से ख़फ़ा रहे.. तो कोई क्या करे?? किसी को पास बुलाओ कि मरहम मिले, फिर भी ना वो आए, तो कोई क्या करे। आशु Read more

  • नींद

    खामोशी ओढ़ ली है मैने, बस अपनी हंसी से नींद भर दो तुम। आशु Read more

  • नींद

    सन्नाटे में भी कितनी आवाजें हैं आसपास मेरे, बस एक वो आवाज़ नहीं है जिसे मैं सुनना चाहता हूँ। आशु Read more

  • छोटा सा गांव एकमा जिक्र में क्यूं नहीं रहता है? हममें सब और सब में गांव क्यूं नहीं बसता है? बात बे बात पे अपनी ही बात कहता है, मेरे अंदर मेरा छोटा सा गांव रहता है। ऐसा लगता है न कि गांव कहीं भूला आए, कहीं छोड़ आए। गांव की बोली भूल आए गांव… Read more

  • नव वर्ष २०२०

    भाग्यलक्ष्मी, नव वर्ष के हर दिवस पर, मैं चाहूंगा तुम्हारा हृदय छूना… इस तरह मैं छू लूंगा तुम्हारे प्रेम से भरा आकाश धरा ग्रह नक्षत्र सूर्य चंद्र सम्पूर्ण सृष्टि और अंततः ईश्वर के घर की चौखट…………. आशु 💙 Read more

  • ऐसा क्यूं होता है..

    [22/12, 22:00] भाग्यलक्ष्मी, “ऐसा क्यों होता है? सुख आदमी को छूता हुआ क्यों निकल जाता है? उसे अपने में समेट कर जम क्यों नहीं जाता, बर्फ की सिल्ली की तरह, ” “सुख केवल कोई क्षण होता है, और मेरा वह क्षण आप ही तो हो.. हम बहुत खुश हैं ,आपके साथ होकर, आप सोच से… Read more

  • तुम्हारी बाहों में गुज़रते उन पलों में न जाने क्या जादू था.. मैं बेखबर था या बेकाबू था.. तुम्हे छुकर महसुस करने की जीद ने, कभी पास रखा, कभी रूठ जाने दिया.. ऊंगलियों की शरारतों ने मखमली नर्म परत को, कभी छू लिया, कभी मुस्कुराने दिया। तुम्हारी बाहों में गुज़रते उन पलों में न जाने… Read more

  • मेरी आकांक्षा,

    मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे ले लो अपने भीतर मैं ठंडा हो जाऊँ और तुम्हें दे दूँ अपनी सारी ऊर्जा.. तुम मुझे कुछ दो या न दो स्नेह का आभास दो अपने बाल, अपनी उंगलियां फेर दो मेरे चेहरे पर.. छोड़ दो अपने होठों से छुआ हर चीज मेरे लिए, छोड़ दो अपनी साँस… Read more

  • एकमा, दिसंबर 18, 2019.

    प्रिय आकांक्षा, प्रेम का यदि रिश्ता, आकार और समय निश्चित हो जाये तो वह प्रेम नही रहता केवल एक विषय वस्तु बनकर रह जाता है, अतएव प्रेम को निराकार, नि:स्वार्थ ही रहने दो प्रकृति की तरह और रंगहीन रहने दो जल की तरह। जीवन तो एक ही है, वो भी अपना नहीं रह पाता.. कुछ… Read more

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