आशुपुराण

ख़्यालों पर अब बंदिशें लगने लगी हैं।

2-9-4

उम्र का एक सिरा तुम्हारे संग बंधा है, और दूसरा वक़्त की अरगनी से… तुम उस ओर थामे रहना, वक़्त को मैं सम्हाल लूंगा 🙂
कुछ बातें उन ख़तों सी होती होती हैं जिन्हें हम कभी पढ़ नहीं पाते। ना किसी के साथ और न किसी के बाद।
हम रास्ते बदल लेते हैं, समझ आता है पर मन कैसे बदल लेते हैं, कभी समझा नहीं।

वक़्त के साथ हर चीज के अर्थ भी बदलते हैं और परिभाषाएं भी., नहीं बदलता है कुछ तो वो है जिंदगी का व्याकरण !

वो तब भी वैसी ही थी जब न अर्थ ढूंढते थे ,ना परिभाषा गढ़ते थे , वो अब भी वैसी है जब रोज नए अर्थ समझाये जा रहे हैं , नई परिभाषाएं लोग सिखा रहे हैं !

ढ़ेरों स्नेह!
आशु😁

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